आर सी पी सिंह से ज्यादा उपेंद्र कुशवाहा क्यों पसंद आने लगे है नितीश कुमार को…

आर सी पी सिंह से ज्यादा उपेंद्र कुशवाहा क्यों पसंद आने लगे है नितीश कुमार को…

जदयू के राष्ट्रिय अध्यक्ष आर सी पी सिंह की जगह उपेंद्र कुशवाहा ले सकते है. हालांकि इस खबर की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश की दोस्ती और दुश्मनी के अनेको किस्से है. हाल में ही अपनी पार्टी रालोसपा का जदयू में विलय करा उपेंद्र कुशवाहा खुद जदयू ज्वाइन कर लिए. और अब नीतीश कुमार के रक्षा कवच के रूप में वो काम कर रहे है. नीतीश कुमार लव-कुश समीकरण को साधने के लिए उन्हें अब जदयू के राष्ट्रिय अध्यक्ष बनाने जा रहे है.

द दैनिक बिहार, सेंट्रल डेस्क : इस मामले पर उपेन्द्र कुशवाहा कहते हैं कि उनकी कोई इच्छा नहीं है जदयू में नंबर दो का नेता होने की। वे नंबर की रेस में नहीं रहते. वे कहते है, “मै तो पार्टी का छोटा सा कार्यकर्ता हूँ और मेरी एक ही इच्छा है की जदयू मज़बूत हो और जो उसका पुराना दौर था वो फिर से वापस लौटे और बिहार की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरे।” वरिष्ठ पत्रकार अरूण पांडेय कहते हैं कि कुशवाहा की घर वापसी के समय नीतीश कुमार के चेहरे पर जो खुशी झलक रही थी उससे साफ़ था की नीतीश के लिए उपेंद्र कुशवाहा क्या मायने रखते हैं।

लव कुश समीकरण
नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से ही जदयू को मज़बूत करने में जुट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने बिहार की राजनीति गणित को समझते हुए अपने पुराने समीकरण लव कुश समीकरण को साधने में लग गए है. उनके इस प्रयोग में वे बहुत हद तक सफल होते भी दिख रहे है, और नीतीश कुमार इसलिए अब पुरस्कार देना चाहते है।कुर्मी और यदुवंशी को कुर्सी तक पहुंचाने में कुशवाहा का अहम योगदान रहा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 74 सीटें मिली जबकि जेडीयू को 43 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव के पहले तक जदयू बड़े भाई की भूमिका में थी, लेकिन मौजूदा स्थिति में वह आरजेडी और बीजेपी के बाद तीसरे स्थान पर है।

2004 में कुशवाहा पहली बार बने थे विधायक

उपेंद्र कुशवाहा करीब आठ साल बाद जेडीयू में लौटे हैं। ऐसी चर्चाएं रही हैं कि पूर्व में नीतीश कुमार के दल समता पार्टी और बाद में जदयू में रहे उपेंद्र कुशवाहा को 2004 में पहली बार विधायक बनकर आने के बावजूद नीतीश कुमार ने कई वरिष्ठ विधायकों की अनदेखी करके कुर्मी और कुशवाहा जातियों के साथ एक शक्तिशाली राजनीतिक साझेदारी को ध्यान में रखते हुए उन्हें बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाया था।

रालोसपा का गठन ही नितीश के खिलाफ हुआ था
2013 में जदयू के राज्यसभा सदस्य रहे कुशवाहा ने विद्रोही तेवर अपनाते हुए जदयू से नाता तोड़कर रालोसपा पार्टी का गठन कर लिया था। वह 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले राजग का हिस्सा बन गए थे. उस चुनाव के बाद कुशवाहा को नरेंद्र मोदी सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री बनाया गया था। जुलाई 2017 में जदयू की राजग में वापसी ने समीकरणों को एक बार फिर बदल दिया और रालोसपा इस गठबंधन से नाता तोड़कर राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा बन गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा ने काराकाट और उजियारपुर लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा था लेकिन वह हार गए थे।

2020 मे बसपा के साथ बनाया गठबंधन
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कुशवाहा ने महागठबंधन से नाता तोड़कर मायावती की बसपा और एआईएमआईएम के साथ नया गठबंधन बनाकर यह चुनाव लड़ा था। बिहार विधानसभा चुनाव में रालोसपा प्रमुख कुशवाहा को उनके गठबंधन द्वारा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया गया था लेकिन इनके गठबंधन में शामिल हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में जहां पांच सीट जीती थी, वहीं रालोसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

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