दिल्ली-मुंबई में रहने वाले लोग बिहार की पहचान भोजपुरी, लिट्टी-चोखा और लालू प्रसाद यादव को ही क्यों बताते है?…

दिल्ली-मुंबई में रहने वाले लोग बिहार की पहचान भोजपुरी, लिट्टी-चोखा और लालू प्रसाद यादव को ही क्यों बताते है?…

मुंबई का नाम सुनते ही एक बिहारी के दिमाग में बॉलीवुड, वड़ा पाव और बाला साहेब ठाकरे का चित्र बन जाता है. तमिलनाडु का नाम सुनते ही नारियल पानी, रजनीकांत और कन्याकुमारी का ख्याल आता है। पंजाब का नाम आते ही खेत-खलिहान, भंगड़ा और लबे चौड़े सरदार जी आंखो के सामने आ जाते है. पश्चिम बंगाल की बात करें तो रसगुल्ला और दुर्गा पूजा जैसे चित्र हमारे ज़ेहन में आ जाते है. ऐसे ही हर राज्य का नाम सुनने पर आपरूपी कुछ चीज़े बिना कुछ सोचे समझे हमारे दिमाग में आ जाती है. आखिर ऐसा क्यों होता है. जवाब है, क्योंकि इन चीज़ों ने उस राज्य से बाहर निकल दूसरे जगहों पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. बिहार से बाहर निकल कर भोजपुरी, लिट्टी-चोखा और लालू प्रसाद यादव ने भी अपनी वही पहचान बनाई हैं.

Udipt Aryan, The Dainik Bihar : भोजपुरी में इन दिनों अश्लीलता को लेकर खूब हो-हल्ला हो रहा है. इसमें कही दो राय नहीं है की भोजपुरी में आज अश्लीलता का बोलबाला है. अश्लीलता के चलते इस भाषा की जग-हंसाई हो रही है. पर इसका यह मतलब कतई नहीं है कि भोजपुरी का यह सबसे बुरा दौर चल रहा है. 2017 में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते भाषाओं की सूचि में भोजपुरी को टॉप टेन में बताया था. संयुक्त राष्ट्र ने भोजपुरी को विश्व की सबसे बड़ी क्षेत्रीय भाषा बताई थी. इसपर देश के एक बड़े पत्रकार रविश कुमार, जो खुद एक भोजपुरी भाषी है, उन्होंने अपने प्राइमटाइम में इसपर विस्तृत चर्चा की थी. आज बिहार के 10 जिले, उत्तर प्रदेश के 17 जिले, मध्य प्रदेश के 3 जिले, झारखण्ड के 3 जिले और दुनिया के एक दर्जन से ज्यादा देशों में रहने वाले करीब 29 करोड़ लोग भोजपुरी में बात कर रहे है. यह दुनिया में 43वीं सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. 200 साल पहले जो गिरमिटिया मजदुर भोजपुर के इलाक़ों से पलायन कर बाहर चले गए थे, उन्होंने मॉरिशस और फिजी जैसे देश बसा दिए. आज उन देशों में भोजपुरी का बोलबाला है। जिस भाषा को बोलने वालों ने बंजर द्धीप को विकसित देश में तब्दील कर दिया, उस भाषा के ख़त्म होने की बात करना बेमानी लगती है.

मनोज तिवारी
प्रवासी दिवस पर मॉरिशस के राष्ट्रपति का भोजपुरी में भाषण

गैर-भोजपुरी भाषी को भी भोजपुरी से ही आकर्षण है


भोजपुरी सिनेमा का इतिहास 59 साल का है. साल 1962 के 5 फ़रवरी को वाराणसी और 22 फ़रवरी को पटना के वीणा सिनेमा में ऐ गंगा मइया तोहे पियरी चढइबो फ़िल्म रिलीज़ हुई थी. इस फिल्म में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायकों ने अपनी आवाज़ दी थी. देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के निर्देश पर गाज़ीपुर निवासी, ठेठ भोजपुरिया नज़ीर हुसैन ने इस फिल्म को बनाया था. तब से आजतक भोजपुरी सिनेमा और संगीत ने कई दौर देखे. कभी कुणाल सिंह और राकेश पांडेय जैसे कलाकारों ने 80 के दौर में एक से बढ़कर एक भोजपुरी की हिट फिल्में दी, तो कभी 90 के दौर में भरत शर्मा व्यास और मनोज तिवारी भोजपुरी के पहचान बनें. और जब 2005 में मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पैसावाला फ़िल्म हिट हुई, फिर उसके बाद मृत पड़ी भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री को जैसे संजीवनी मिल गई. तब से आज तक हज़ारों भोजपुरी सिनेमा बनी, जिसमें अमिताभ बच्चन और अजय देवगन सरीखे कलाकारों ने अभिनय किया। इनके अलावा खेसारी लाल यादव, पवन सिंह और दिनेश लाल यादव जैसे कलाकारों ने कितनी हिट फिल्में दी. और इन्हीं तीन कलाकारों ने भोजपुरी में अश्लीलता को चरम पर पहुंचाया। पर यहां सवाल उठता है की इन कलाकारों को हिट किसने बनाया?

पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मइया, तोहे पियरी चढ़इबो’ का पोस्टर

आज भी बिहार के किसी भी गैर-भोजपुरी इलाक़ों में जाने पर किसी भी अवसर पर भोजपुरी गाने ही सुनने को मिलते है. ईमानदारी से कहे तो पंजाबी और भोजपुरी गीतों के बिना कोई भी शादी में नाच ही नहीं पायेगा. और ये कोई आज की बात नहीं है. भोजपुरी पुरे बिहार और आधे उत्तर प्रदेश पर आधी सदी से राज कर रहा है. भोजपुरी के अलावा बिहार के किसी भी भाषा ने आजतक वैसा बड़ा फिल्म इंडस्ट्री दिया जिससे वहां के कलाकार अपनी भाषा में काम करने के लिये आकर्षित हो. पंकज त्रिपाठी और मनोज बाजपेयी भी भोजपुर के इलाके से ही आते है। आज अगर किसी भी बिहारी से आप भोजपुरी के अलावा अन्य किसी भी भाषा के कोई एक्टर, गायक या संगीतकार का नाम पूछ दे, तो वो निरुत्तर हो जाएगा. आज कोई भी नेशनल न्यूज़ चैनल पर होली, छठ या बिहार से सम्बंधित कोई भी कार्यक्रम हो तो वहां भोजपुरी में ही शो होता है. और शायद यही कारण है की बक्सर का लिट्टी-चोखा आज बिहार का पहचान बन गया है. हालांकि, इसके अलावा दही-चुरा जैसे व्यंजन भी बिहार में बहुत चाव से खाया जाता है, लेकिन, बिहार से बाहर इसकी कोई पहचान नहीं बन पाई. क्योंकि लिट्टी-चोखा की ब्रांडिंग खुद लालू प्रसाद यादव करते है। इंटरनेशनल लिट्टी-चोखा जैसे गीत मनोज तिवारी गाते है, जो पूरे भारत में सुना जाता है। यही भोजपुरी की ताकत है, जिसके चलते शुरू से आज तक गैर-भोजपुरी भाषी भो भोजपुरी में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं. अब मौजूदा प्रसंग को ही ले लीजिए, अश्लीलता का मामला गरमाया हुआ है. ऐसे में बहुत से गैर-भोजपुरी भाषी अपना चैनल भोजपुरी से अश्लीलता हटाने के नाम पर चमका रहे है, और ये वही लोग है जो कभी इस भाषा को संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल कराने के लिए अपने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तक नहीं लिखते.

10 फरवरी 2006 को रिलीस हुई ‘धरती कहे पुकार के’
16 नवंबर 2007 को रिलीस हुई ‘गंगोत्री’

क्या है भोजपुरी है भविष्य?

अंग्रेजों के जमाने के बहुभाषाविद् और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषावैज्ञानिक डॉ जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भोजपुरी के सम्बन्ध में कहा था की यह भाषा उस वीर मंगल पांडेय की है, जिसने देश में स्वतंत्रता अभियान की शुरुवात की, यह भाषा उस वीर कुंवर सिंह की है, जिसके चलते आरा से बलिया तक के इलाके को अंग्रेजो ने रेड जोन घोषित कर दिया था, ये वही भाषा है जिसके लोग इतने कर्मठ होते है कि उन्हें दुनिया के किसी भी बंजर भूमि पर छोड़ देने पर वो वहां देश का निर्माण कर देते है, ये उन लोगो की भाषा है जो लड़ाके है, जो चुप रहना नहीं जानते. डॉ ग्रियर्सन ने कहा था कि उत्तर भारत में भोजपुर इलाके के लोग बाकी सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों से जादा जुझारू और शारीरिक रूप से बलिष्ठ होते है।

आमिर खान पटना में लिट्टी-चोखा का स्वाद लेते हुए
मनोज बाजपेयी & पंकज त्रिपाठी

ऐसे में गैर-भोजपुरी भाषी भोजपुरी में फैली अश्लीलता पर बहुत चिंता ना करे, हां! अगर भोजपुरी से प्यार करते है तो इसे अष्टम अनुसूची में शामिल कराने के लिए प्रयास करें. भोजपुरी से अश्लीलता ख़त्म हो जाएगी, वो दिन भी अब दूर नहीं है. और भोजपुर के 29 करोड़ लोग इसे ख़त्म करने में सक्षम है.

भोजपुरी महोत्सव में लालू प्रसाद यादव

लालू प्रसाद यादव भी भोजपुरी भाषी ही है. गोपालगंज में जन्मे लालू प्रसाद यादव आज विश्व विख्यात है. शायद ही बिहार का कोई नेता लालू प्रसाद जितना प्रसिद्धि पाया होगा. उनके पक्ष-विपक्ष की बात छोड़ भी दे तो इसमें कही दो राय नहीं है की उन्हें हर कोई सुनना चाहता है. कारण है उनकी भाषा शैली. हिंदी में अर्ध-मिश्रित भोजपुरी को खांट भोजपुरी लय में परोसना लालू यादव को अलग बना देता है. लोकसभा हो या विधानसभा, सभी जगह लालू ने अपना यह अंदाज बरक़रार रखा. इसलिए भोजपुरी के बारे में यह मान लेना चाहिए की यह स्वतः बढ़ने वाली भाषा है.

भोजपुरी चैनल महुआ टीवी में लालू प्रसाद यादव

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