आख़िर क्यों मुंडा का नाम सुनकर कांप जाती थी अंग्रेजों की रुह?..

आख़िर क्यों मुंडा का नाम सुनकर कांप जाती थी अंग्रेजों की रुह?..

डोंबारी  पहाड़ पर अंग्रेजों ने निहत्थे  मुंडाओं पर गोलियों बरसानी शुरू कर दी इस दौरान बिरसा वहां से निकलने में सफल रहे 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा की मौत संदिग्ध अवस्था में हो गई।

रिया पांडेय, द दैनिक बिहार : देखो अंग्रेज सिपाही आ गए हैं।  बिरसा के अनुयायी भी आ गए हैं। देखो उन्होंने गोलियां चलाई । अंग्रेज सिपाही भागे।  उलीहातू से लेकर डोम्बारी बुरु और सईल रकब  की पहाड़ियों तक में ये गीत आज ही गूंज रहा है। न केवल गीत, बल्कि वो संघर्ष भी जारी है.. जल, जंगल, जमीन का। 117 साल बाद भी। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा में अमिट  छाप छोड़ी है। ये बताने की जरूरत नहीं, आज ही के दिन बिरसा मुंडा ने आखिरी सांस ली थी। वो तारीख भी 9 जून, 1900।  कभी न अस्त होने वाले सूर्य का दंभ भरने  वाली अंग्रेजी राजसत्ता महज 25 साल के इस युवक से इतना घबरा गई कि उसने रातों-रात डिस्टिलरी पुल के पास उनका दाह संस्कार कर दिया। उसने  उजाले तक भी सब्र करना उचित नहीं समझा और न ही परिवार वालों को खबर देना। जेल में  वो अंग्रेजी सत्ता के वजह से बीमारी हो गए और इस बीमारी से लड़ते हुए बिरसा शहीद हो गए, लेकिन लड़ाई कभी खत्म नहीं हुई।

बिरसा मुंडा ने  कैसे जीता जंग अंग्रेजो के खिलाफ
इतिहास बताते हैं कि 15 नवंबर 1857 को जन्मे बिरसा ने 1 अक्टूबर 1894 को सभी मुंडाओं को एकत्र कर अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आंदोलन छेड़ दिया। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की । हड़िया का नशा मत करो । जीव, जंतु, जंगल, जल ,जमीन की सेवा करो.. समाज पर मुसीबत आने वाली है, संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ , काले गोरे सभी दुश्मनों की पहचान कर उनका मुकाबला करो..। छोटी सी उम्र में पहाड़ सा संकल्प लेकर आगे बढ़े। युवाओं को संगठित किया। नशे से दूर रहने का संकल्प और अपने दुश्मनों की सही पहचान की। नया धर्म बिरसाइत  चलाया , जिसके अनुयायी आज भी हैं।
उस समय थी उनके जादुई नेतृत्व के मुरीद सभी थे। उलीहातू से लेकर चाईबासा तक। जंगल, जल,  जमीन की लड़ाई में जंगल सुलगने लगे थे। पहाड़ों पर बैठकों का दौर शुरू हुआ था। जंगल की आग नगरों तक फैली और उलगुलान शुरू हो गया। बिरसा के पास कोई आधुनिक हथियार नहीं थे। बस तीर धनुष जैसे पारंपरिक हथियार थे। कई तो गुलेल से भी लड़ रहे थे। इन्हीं हथियारों से वो दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यवादी सत्ता से लोहा ले रहे थे। इस युद्ध में वीरता के साथ बिरसा के  साथी भी शहीद हुए,  लेकिन उनकी कुर्बानियां बेकार नहीं गई थी। अंग्रेजों को अंततः  सीएनटी एक्ट बनाना पड़ा।

नौ जून 1900 को बिरसा मुंडा का निधन हुआ
9 जून यानी बुधवार को बिरसा मुंडा झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि मनाई जा रही है। बिरसा मुंडा को 9 जून 1900  रांची के जेल मोड़  स्थित कारागार में शहीद हुए थे। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में 1897 से 1900 के  बीच मुंडा समाज के लोग अंग्रेजों से लोहा लेते रहे थे। बिरसा मुंडा और उनके साथियों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए थे। अगस्त 1897 में बिरसा और उनके सिपाहियों ने तीर कमान से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोल दिया था। 1898 में मुंडा और अंग्रेज सेनाओं में युद्ध हुआ था। इसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई।  इस युद्ध में अंग्रेजों को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद खिसियाए हुए अंग्रेजों ने आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू कर दी। जनवरी 1900 में डोम्बारी पहाड़ी पर एक और झड़प हुई थी।
इसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गए थे।  यहां बिरसा मुंडा अपनी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। तभी अंग्रेजों ने धावा बोल दिया था। बाद में बिरसा के कुछ साथियों की गिरफ्तारी हुई। अंत में 3 फरवरी 1900 को बिरसा मुंडा को चक्रधरपुर  में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें रांची की जेल में रखा गया। बिरसा मुंडा ने 9 जून 1900  को शहादत प्राप्त की थी।आज भी झारखंड के अलावा उड़ीसा,  छत्तीसगढ़,  पश्चिम बंगाल , आसाम आदि इलाकों के आदिवासी बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूछते हैं।

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